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पिछली प्रविष्टी से आगे
हिन्दू धर्म सम्पत्ति की भावना , संचय न करने और लगाव न रखने के सिद्धान्त के कारण उदार है । लेकिन कट्टरपंथी हिन्दू कर्म सिद्धान्त की इस प्रकार व्याख्या करता है कि धन और जन्म या शक्ति में बड़े व्यक्ति का स्थान ऊंचा है और जो कुछ है , वही ठीक भी है । सम्पत्ति का मौजूदा सवाल कि मिल्कियत निजी हो या सामाजिक हाल ही का है । लेकिन सम्पत्ति की स्वीकृत व्यवस्था या सम्पत्ति से कोई लगाव न रखने के रूप में यह सवाल हिन्दू दिमाग में बराबर रहा है । अन्य सवालों की तरह सम्पत्ति और शक्ति के सवालों पर भी हिन्दू दिमाग अपने विचारों को अपनी तार्किक परिणति तक कभी नहीं ले जा पाया । समय और व्यक्ति के साथ हिन्दू धर्म में इतना ही फर्क पड़ता है कि सम्पत्ति के एक या दूसरे विचार को प्राथमिकता मिलती है । आम तौर पर यह माना जाता है कि सहिष्णुता हिन्दुओं का विशेष गुण है । यह गलत है , सिवाय इसके कि खुला उत्पात अभी तक उसे पसन्द नहीं रहा ।हिन्दू धर्म में कट्टर पंथी हमेशा प्रभुताशाली मत के अलावा अन्य मतों और विश्वासों का दमन करके एकरूपता के द्वारा एकता कायम करने की कोशिश करते रहे हैं लेकिन उन्हें कभी सफलता नहीं मिली ।उन्हें अब तक , आम तौर पर , बचपना ही माना जाता था क्योंकि कुछ समय पहले तक विविधता में एकता का सिद्धान्त हिन्दू धर्म के अपने मतों पर ही लागू किया जाता था । इसलिए हिन्दू धर्म में लगभग हमेशा ही सहिष्णुता का अंश बल प्रयोग से ज्यादा रहता था । लेकिन यूरोप के बुद्धिवाद ने इससे मिलते-जुलते जिस सिद्धान्त को जन्म दिया है , उससे उसका अर्थ समझ लेना चाहिए । वाल्टेयर जानता था कि उसका विरोधी गलती पर है ,फिर भी वह सहिष्णुता के के लिए , विरोध के खुलकर बोलने के अधिकार के लिए लड़ने को तैयार था इसके विपरीत हिन्दू धर्म में सहिष्णुता की बुनियाद पर यह है कि अलग-अलग बातें भी अपनी जगह पर सही हो सकती हैं । वह मानता है कि अलग -अलग क्षेत्रों और वर्गों में अलग सिद्धान्त और चलन हो सकते हैं , और उनकी बीच वह कोई फैसला करने को तैयार नहीं । वह आदमी की जिन्दगी में एकरूपता नहीं चाहता , स्वेच्छा से भी नहीं , और ऐसी विविधता में एकता चाहता है जिसकी परिभाषा नहीं की जा सकती , लेकिन जो अब तक उसके अलग – अलग मतों को एक लड़ी में पिरोती रही है । अत: उसमें सहिष्णुता का गुण इस विश्वास के कारण है कि किसी भी जिन्दगी में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए इस विश्वास के कारण कि अलग-अलग बातें गलत ही हों यह जरूरी नहीं है , बल्कि वे सच्चाई को अलग – अलग ढंग से व्यक्त कर सकती हैं ।
कट्टरपंथियों ने अक्सर हिन्दू धर्म में एकरूपता की एकता कायम करने की कोशिश की है । उनके उद्देश्य हमेशा़ संदिग्ध नहीं रहे । उनकी कोशिशों के पीछे अक्सर शायद स्थायित्व और शक्ति की इच्छा थी , लेकिन उनके कामों के नतीजे हमेशा बहुत बुरे हुए । मैं भारतीय इतिहास का एक भी ऐसा काल नहीं जानता जिसमें कट्टरपंथी हिन्दू धर्म भारत में एकता या खुशहाली ला सका हो । जब भी भारत में एकता या खुशहाली आई , तो हमेशा वर्ण , स्त्री , सम्पत्ति , सहिष्णुता आदि के सम्बन्ध में हिन्दू धर्म में उदारवादियों का प्रभाव अधिक था । हिन्दू धर्म में कट्टरपंथी जोश बढ़ने पर हमेशा देश सामाजिक और राज्नीतिक दृष्टियों से टूटा है और भारतीय राष्ट्र में , राज्य और समुदाय के रूप में बिखराव आया है । मैं नहीं कह सकता कि ऐसे सभी काल , जिनमें देश टूट कर छोटे-छोटे राज्यों में बंट गया , कट्टरपंथी प्रभुता के काल थे , लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि देश में एकता तभी आई जब हिन्दू दिमाग पर उदार विचारों का प्रभाव था ।
आधुनिक इतिहास में देश में एकता लाने की कई बड़ी कोशिशें असफल हुईं । ज्ञानेश्वर का उदार मत शिवाजी और प्रथम बाजीराव के काल में अपनी चोटी पर पहुंचा , लेकिन सफल होने के पहले ही पेशवाओं की कट्टरता में गिर गया । फिर गुरु नानक के उदारमत से शुरु होने वाला आन्दोलन रणजीत सिंह के समय अपनी चोटी पर पहुंचा , लेकिन जल्द ही सिक्ख सरदारों के कट्टरपंथी झगड़ों में पतित हो गया । ये कोशिशें , जो एक बार असफल हो गयीं , आजकल फिर से उठने की बड़ी तेज कोशिशें करतीं हैं , क्योंकि , इस समय महाराष्ट्र और पंजाब से कट्टरता की जो धारा उठ रही है , उसका इन कोशिशों से गहरा और पापपूर्ण आत्मिक सम्बन्ध है । इन सब में भारतीय इतिहास के विद्यार्थी के लिए पढ़ने और समझने की बड़ी सामग्री है जैसे धार्मिक सन्तों और देश में एकता लाने की राजनीतिक कोशिशों के बीच कैसा निकट सम्बन्ध है या कि पतन के बीज कहां हैं, बिलकुल शुरु में या बाद की किसी गड़बड़ी में या कि इन समूहों द्वारा अपनी कट्टरपंथी सफलताओं को दुहराने की कोशिशों के पीछे क्या कारण हैं ? इसी तरह विजयनगर की कोशिश और उसके पीछे प्रेरणा निम्बार्क की थी या शंकराचार्य की , हुम्फी की महानता के पीछे कौन-सा सड़ा हुआ बीज था , इन सब बातों की खोज से बड़ा लाभ हो सकता है । फिर शेरशाह और अकबर की उदार कोशिशों के पीछे क्या था और औरंगजेब की कट्टरता के आगे उनकी हार क्यों हुई ।
देश में एकता लाने की भारतीय लोगों और महात्मा गांधी की एकदम हाल की कोशिश कामयाब हुई है , लेकिन आंशिक रूप में ही।इसमें कोई शक नहीं कि पांच हजार वर्षों से अधिक की उदारवादी धाराओं ने इस कोशिश को आगे बढ़ाया , लेकिन इसके तकालीन स्रोत में यूरोप के उदारवादी प्रभाव के अलावा क्या है, तुलसी या कबीर या चैतन्य और सन्तोंकी महान परम्परा या अधिक हाल के धार्मिक राजनीतिक नेता जैसे राममोहन राय और फैजाबाद के विद्रोही मौलवी । फिर, पिछले पांच हजार सालों की कट्टरपंथी धारायें भी मिलकर इस कोशिश को असफल बनाने के लिए जोर लगा रही हैं और अगर इस बार कट्टरता की हार हुई , तो वह फिर नहीं उठेगी ।
केवल उदारता ही देश में एकता ला सकती है । हिन्दुस्तान बहुत बड़ा और पुराना देश है । मनुष्य की इच्छा के अलावा कोई शक्ति इसमें एकता नहीं ला सकती । कट्टरपंथी हिन्दुत्व अपने स्वभाव के कारण ही ऐसी इच्छा नहीं पैदा कर सकता , लेकिन उदार हिन्दुत्व कर सकता है , जैसा पहिले कई बार कर चुका है । हिन्दू धर्म संकुचित दृष्टि से , राजनीतिक धर्म , सिद्धान्तों और संगठन का धर्म नहीं है । लेकिन राजनीतिक देश के इतिहास में एकता लाने की बड़ी कोशिशों को इससे प्रेरणा मिली है ,और उनका यह प्रमुख माध्यम रहा है ।हिन्दू धर्म में उदारता और कट्टरता के महान युद्ध को देश की एकता और बिखराव की शक्तियों का संघर्ष भी कहा जा सकता है । लेकिन उदार हिन्दुत्व पूरी तरह समस्या का हल नहीं कर सका । विविधता में एकता के सिद्धान्त के पीछे सड़न और बिखराव के बीज छिपे हैं । कट्टरपंथी तत्वों के अलावा जो हमेशा ऊपर से उदार हिन्दू विचारों में घुस आते हैं और हमेशा दिमागी सफाई हासिल करने में रुकावट डालते हैं , विविधता में एकता का सिद्धान्त ऐसे दिमाग को जन्म देता है जो समृद्ध और निष्क्रिय दोनों ही है । हिन्दू धर्म का बराबर छोटे-छोटे मतों में बंटते रहना बड़ा बुरा है, जिनमें से हर एक अपना अलग शोर मचाये रहता है और उदार हिन्दुत्व उनको एकता के आवरण में ढकने की चाहे जितनी भी कोशिश करे , वे अनिवार्य ही राज्य के सामूहिक जीवन में कमजोरी पैदा करते हैं।एक आश्चर्यजनक उदासीनता फैल जाती है ।कोई इन बराबर होने वाले बंटवारों की चिन्ता नहीं करता जैसे सबको यकीन हो कि वे एक दूसरे के ही अंग हैं । इसी से कट्टरपंथी हिन्दुत्व को अवसर मिलता है और शक्ति की इच्छा के रूप में चालक शक्ति मिलती है , हालांकि उसकी कोशिशों के फलस्वरूप और भी ज्यादा कमजोरी पैदा होती है ।
उदार और कट्टरपंथी हिन्दुत्व के महायुद्ध का बाहरी रूप आज-कल यह हो गया है कि मुसलमानों के प्रति क्या रुख हो । लेकिन हम एक क्षण के लिए भी यह न भूलें कि यह बाहरी रूप है और बुनियादी झगड़े जो अभी तक हल नहीं हुए , कहीं अधिक निर्णायक हैं। महात्मा गांधी की हत्या , हिन्दू-मुस्लिम झगड़े की घटना उतनी नहीं थी जितनी हिन्दू धर्म की उदार व कट्टरपंथी धाराओं के युद्ध की। इसके पहले कभी किसी हिन्दू ने वर्ण , स्त्री , सम्पत्ति और सहिष्णुता के बारे में कट्टरता पर इतनी गहरी चोट नहीं की थीं। इसके खिलाफ सारा जहर इकट्ठा हो रहा था । एक बार पहले भी गांधीजी की हत्या करने की कोशिश की गई थी । उस समय उसका खुला और साफ उद्देश्य यही था कि वर्ण व्यवस्था को बचाकर हिन्दू धर्म की रक्षा की जाय । आखिरी और कामयाब कोशिश का उद्देश्य ऊपर से यह दिखाई पड़ता था कि इस्लाम के हमले से हिन्दू धर्म को बचाया जाय , लेकिन इतिहास के किसी भी विद्यार्थी को कोई सन्देह नहीं होगा कि यह सबसे बड़ा और जघन्य जुआ था , जो हारती हुई कट्टरता ने उदारता से अपने युद्ध में खेला । गांधीजी का हत्यारा , वह कट्टरपंथी तत्व था जो हमेशा हिन्दू दिमाग के अन्दर बैठा रहता है , कभी दबा हुआ और कभी प्रकट , कुछ हिन्दुओं में निष्क्रिय और कुछ में तेजी से । जब इतिहास के पन्ने गांधीजी की हत्या को कट्टरपंथी – उदार हिन्दुत्व के युद्ध की एक घटना के रूप में रखेंगे और उन सभी पर अभियोग लगायेंगे जिन्हें वर्णों के खिलाफ और स्त्रियों के हक में , सम्पत्ति के खिलाफ और सहिष्णुता के हक में , गांधीजी के कामों से गुस्सा आया था , तब शायद हिन्दू धर्म की निष्क्रियता और उदासीनता नष्ट हो जाए ।
अब तक हिन्दू धर्म के अन्दर कट्टर और उदार एक – दूसरे से जुड़े क्यों रहे और अभी तक उनके बीच कोई साफ और निर्णायक लड़ाई क्यों नहीं हुई , यह एक ऐसा विषय है जिस पर भारतीय इतिहास के विद्यार्थी खोज करें तो बड़ा लाभ हो सकता है ।अब तक हिन्दू दिमाग से कट्टरता कभी पूरी तरह दूर नहीं हुई , इसमें कोई शक नहीं । इस झगड़े का कोई हल न होने के विनाशपूर्ण नतीजे निकले , इसमें भी कोई शक नहीं । जब तक हिन्दुओं के दिमाग में वर्णभेद बिल्कुल ही खतम नहीं होते, या स्त्री को बिल्कुल पुरुष के बराबर ही नहीं माना जाता , या सम्पत्ति और व्यवस्था के सम्बन्ध को पूरी तरह तोड़ा नहीं जाता तब तक कट्टरता भारतीय इतिहास में अपना विनाशकारी काम करती रहेगी और उसकी निष्क्रियता को कायम रखेगी । अन्य धर्मों की तरह हिन्दू धर्म सिद्धान्तों और बंधे हुए नियमों का धर्म नहीं है बल्कि सामाजिक संगठन का एक ढंग है , और यही कारण है कि उदारता और कट्टरता का युद्ध कभी समाप्ति तक नहीं लड़ा गया और ब्राह्मण-बनिया मिलकर सदियों से देश पर अच्छा या बुरा शासन करते आए हैं जिसमें कभी उदारवादी ऊपर रहते हैं कभी कट्टरपंथी ।
उन चार सवालों पर केवल उदारता से काम नहीं चलेगा । अंतिम रूप से उनका हल करके हिन्दू दिमाग से इस झगड़े को पूरी तरह खतम करना होगा । इन सभी हल न होनेवाले झगड़ों की पीछे निर्गुण और सगुण सत्य के सम्बन्ध का दार्शनिक सवाल है । इस सवाल पर उदार और कट्टर हिन्दुओं के रुख में बहुत कम अन्तर है । मोटे तौर पर , हिन्दू धर्म सगुण सत्य के आगे निर्गुण सत्य की खोज में जाना चाहता है , वह सृष्टि को झूठा तो नहीं मानता लेकिन घटिया किस्म का सत्य मानता है । दिमाग से उठकर परम सत्य तक पहुंचने के लिये वह इस घटिया सत्य को छोड़ देता है । वस्तुत: सभी देशों का दर्शन इसी सवाल को उठाता है । दूसरे देशों में यह सवाल अदिकतर दर्शन में ही सीमित रहा है , जबकि हिन्दुस्तान में यह जनसाधारण के विश्वास का एक अंग बन गया है ।
दर्शन को संगीत की धुनें दे कर विश्वास में बल दिया गया है । दार्शनिकों ने परम सत्य की खोज में आम तौर पर सांसारिक सत्य से बिल्कुल ही इन्कार किया है । इस कारण आधुनिक विश्व पर उसका प्रभाव बहुत कम पड़ा है । लेकिन दूसरे देशों में वैज्ञानिक और सांसारिक भावना ने बड़ी उत्सुकता से प्रकृति की सारी जानकारी को इकट्ठा किया , अलग – अलग करके क्रमबद्ध किया और उन्हें एक में बाँधने वाले नियम खोज निकाले ।इससे आधुनिक मनुष्य को , जो मुख्यत: यूरोपीय है , जीवन पर विचार कर एक खास दृष्टिकोण मिला है । वह सगुण सत्य को , जैसा है वैसा ही बड़ी खुशी से स्वीकार लेता है । इसके अलावा ईसाई मत की नैतिकता ने मनुष्य के अच्छे कामों को ईश्वरीय काम का पद प्रदान किया है ।इन सबके फलस्वरूप जीवन की असलियतों का वैज्ञानिक और नैतिक उपयोग होता है । लेकिन हिन्दू धर्म कभी अपने दार्शनिक आधार से छुटकारा नहीं पा सका । लोगों का साधारण विश्वास भी व्यक्त और प्रकट सगुण सत्य से आगे जाकर अव्यक्त और अप्रकट निर्गुण सत्य को देखना चाहता है । यूरोप में भी मध्य युग में ऐसा ही दृष्टिकोण था लेकिन फिर कह दूं कि यह दार्शनिकों तक ही सीमित था और सगुण सत्य से इन्कार कर करके उसे नकली मानता था जबकि आम लोग ईसाई मत को नैतिक विश्वास के रूप में मानते थे और उस हद तक स्वीकार करते थे । हिन्दू धर्म ने कभी जीवन की असलियतों से बिल्कुल इन्कार नहीं किया बल्कि वह उन्हें घटिया किस्म का सत्य मानता है और आज तक हमेशा ऊंचे प्रकार के सत्य की खोज करने की कोशिश करता रहा है । यह लोगों के साधारण विश्वास का अंग है ।
एक बड़ा अच्छा उदाहरण मुझे याद आता है । कोणार्क के विशाल लेकिन आधे नष्ट मंदिर में पत्थरों पर हजारों मूर्तियां खुदी हुई मिलती हैं। जिन्दगी की असलियतों की तस्वीरें देने में कलाकार ने किसी तरह की की कंजूसी या संकोच नहीं दिखाया है । जिंदगी की सारी विभिन्नताओं को उसने स्वीकार किया है । उसमें भी एक क्रमबद्ध व्यवस्था मालूम पड़ती है । सबसे नीचे की मूर्तियों में शिकार , उसके ऊपर प्रेम , फिर संगीत और फिर शक्ति का चित्रण है ।हर चीज में बड़ीशक्ति और क्रियाशीलता है । लेकिन मन्दिर के अन्दर कुछ नहीम है , और जो मूर्तियां हैं भी उनमें शान्ति और खामोशी का चित्रण है । बाहर की गति और क्रियाशीलता से अन्दर की खामोशी और स्थिरता ,मंदिर में बुनियादी तौर पर यही अंकित है । परम सत्य की खोज कभी बन्द नहीं हुई ।
चित्रकला की अपेक्षा वास्तुकला और मूर्तिकला के अधिक विकास की भी अपनी अलग कहानी है । वस्तुत: जो प्राचीन चित्र अब भी मिलते है, वास्तुकला पर ही आधारित हैं । सम्भवत: परम सत्य के बारे में अपने विचारों को व्यक्त करना चित्रकला की अपेक्षा वास्तुकला और मूर्तिकला में ज्यादा सरल है ।
अत: हिन्दू व्यक्तित्व दो हिस्सों में बंट गया है । अच्छी हालत में हिन्दू सगुण सत्य को स्वीकार करके भी निर्गुण परम सत्य को नहीं भूलता और बराबर अपनी अन्तर्दृष्टि को विकसित करने की कोशिश करता रहता है, और बुरी हालत में उसका पाखंड असीमित होता है । हिन्दू शायद दुनिया का सबसे बडा पाखंडी होता है, क्योंकि वह न सिर्फ दुनिया के सभी पाखंडियों की तरह दूसरों को धोखा देता है बल्कि अपने को धोखा देकर खुद अपना नुकसान भी करता है । हिन्दू धर्म अपने माननेवालों को , छोटे से छोटे को भी, ऐसी दार्शनिक समानता , मनुष्य और मनुष्य और अन्य वस्तुओं की एकता प्रदान करता है जिसकी मिसाल कहीं और नहीं मिलती। दार्शनिक समानता के इस विश्वास के साथ ही गन्दी से गन्दी सामाजिक विषमता का व्यवहार चलता है । मुझे अक्सर लगता है कि दार्शनिक हिन्दू खुशहाल होने पर गरीबों और शूद्रों से पशुओं जैसा , पशुओं से पत्थरों जैसा और अन्य वस्तुओं से दूसरी वस्तुओं की तरह व्यवहार करता है । शाकाहार और अहिंसा गिर कर छिपी हुई क्रूरता बन जाती है । अब तक की सभी मानवीय चेष्टाओं के बारे में यह कहा जा सकता है कि एक न एक स्थिति में हर जगह सत्य क्रूरता में बदल जाता है और सुन्दरता अनैतिकता में ।लेकिन हिन्दू धर्म में यह औरों की अपेक्षा ज्यादा सच है ।हिन्दू धर्म ने सचाई और सुन्दरता की ऐसी चोटियां हासिल कीं जो किसी और देश में नहीं मिलतीं, लेकिन वह ऐसे अंधेरे गड्ढों में भी गिरा है जहां तक किसी और देश का मनुष्य नहीं गिरा । जब तक हिन्दू जीवन की असलियतों को , काम और मशीन , जीवन और पैदावार , परिवार और जनसंख्या वृद्धि , गरीबी और अत्याचार और ऐसी अन्य असलियतों को वैज्ञानिक और लौकिक दृष्टि से स्वीकार करना नहीं सीखता , तब तक वह अपने बंटे हुए दिमाग पर काबू नहीं पा सकता और न कट्टरता को ही खतम कर सकता है , जिसने अक्सर उसका सत्यानाश किया है ।
( जारी )
October 23, 2008 at 9:47 pm |
Bahut achha prayas hai. BHU se juda reha hun. Lohiajia ka mahatwapurn lekh Blog pe daal ke apne bada kam kia hai. aise lekh lagataar dalte rehen. Shubhkamna aur apeksha ke sath
Pramod