हिन्दू बनाम हिन्दू : डॉ. राममनोहर लोहिया

By अफ़लातून

    भारतीय इतिहास की सबसे बड़ी लड़ाई हिन्दू धर्म में उदारवाद और कट्टरता की लड़ाई , पिछले पांच हजार सालों से भी अधिक समय से चल रही है और उसका अन्त अभी भी दिखाई नहीं पड़ता । इस बात की कोई कोशिश नहीं की गयी , जो होनी चाहिए थी , कि इस लड़ाई को नजर में रखकर हिन्दुस्तान के इतिहास को देखा जाए , उसे बुना जाय । लेकिन देश में जो कुछ होता है , उसका बहुत बड़ा हिस्सा इसी के कारण होता है ।

    सभी धर्मों में किसी-न-किसी समय उदारवादियों और कट्टरपंथियों की लड़ाई हुई है । लेकिन हिन्दू धर्म के अलावा वे बंट गये , अक्सर उनमें रक्तपात हुआ और थोड़े या बहुत दिनों की लड़ाई के बाद , वे झगड़े पर काबू पाने में कामयाब हो गये । हिन्दू धर्म में लगातार उदारवादियों और कट्टरपंथियों का झगड़ा चला आ रहा है । जिसमें कभी एक की जीत होती है कभी दूसरे की । खुला रक्तपात तो कभी नहीं हुआ , लेकिन झगड़ा आजतक हल नहीं हुआ और झगड़े के सवालों पर एक धुन्ध छा गयी है ।

    ईसाई , इस्लाम और बौद्ध , सभी धर्मों में झगड़े-विभेद हुए । कैथोलिक मत में एक समय इतने कट्टर पंथी तत्त्व इकट्ठा हो गए कि प्रोटेस्टेंट मत ने , जो उस समय उदारवादी था , उसे चुनौती दी । लेकिन सभी लोग जानते हैं कि सुधार आन्दोलन के बाद प्रोटेस्टेंट मत में खुद में कट्टरता आ गयी । कैथोलिक और प्रोटेस्टेन्ट मतों के सिद्धान्तों में अब भी बहुतेरे फर्क हैं लेकिन एक को कट्टर पंथी और दूसरे को उदारवादी कहना मुश्किल है । ईसाई धर्म में सिद्धान्त और संगठन का भेद है तो इस्लाम धर्म में शिया-सुन्नी का बंटवारा इतिहास से सम्बन्धित है । इसी तरह बौद्ध धर्म हीनयान और महायान के दो मतों में बंट गया , और उनमें कभी रक्तपात तो नहीं हुआ , लेकिन उनका मतभेद सिद्धान्त के बारे में है , समाज की व्यवस्था से उसका कोई सम्बन्ध नहीं ।

    हिन्दू धर्म में ऐसा कोई बंटवारा नहीं हुआ । अलबत्ता वह बराबर छोटे-छोटे मतों में टूटता रहा है । नया मत उतनी ही बार उसके एक नये हिस्से के रूप में वापस आ गया है । इसीलिए सिद्धान्त के सवाल कभी साथ-साथ नहीं उठे और परिभाषित नहीं हुए , सामाजिक संघर्षों का हल नहीं हुआ । हिन्दू धर्म नये मतों को जन्म देने में उतना ही तेज है जितना प्रोटेस्टेन्ट मत , लेकिन उन सभी के ऊपर वह एकता का एक अजीब आवरण डाल देता है जैसी एकता कैथोलिक संगठनों ने अन्दरूनी भेदों पर रोक लगा कर कायम की है । इस तरह हिन्दू धर्म में जहां एक ओर कट्टरता और अन्धविश्वास का घर है , वहां नई-नई खोजों की व्यवस्था भी है । हिन्दू धर्म अब तक अपने अन्दर उदारवाद और कट्टरता के झगड़े का हल क्यों नहीं कर सका , इसका पता लगाने की कोशिश करने के पहले , जो बुनियादी दृष्टिभेद हमेशा रहा है , उस पर नजर डालना जरूरी है । चार बड़े और ठोस सवालों – वर्ण , स्त्री , सम्पत्ति और सहनशीलता के बारे में हिन्दू धर्म बराबर उदारवाद और कट्टरता का रुख बारीबारी से लेता रहा है ।

    चार हजार साल या उससे भी अधिक समय पहले कुछ हिन्दुओं के कान में दूसरे हिन्दुओं के द्वारा सीसा गलाकर डाल दिया जाता था और उनकी जबान खींच ली जाती थी । क्योंकि वर्ण व्यवस्था का नियम था कि कोई शूद्र वेदों को पढे या सुने नहीं । तीन सौ साल पहले शिवाजी को यह मानना पड़ा था कि उनका वंश हमेशा ब्राह्मणों को ही मन्त्री बनायेगा ताकि हिन्दू रीतियों के अनुसार उनका राजतिलक हो सके । करीब दो सौ वर्ष पहले , पनीपत की आखिरी लड़ाई में जिसके फलस्वरूप हिन्दुस्तान पर अंग्रेजों का राज्य कायम हुआ , एक हिन्दू सरदार दूसरे सरदार से इसलिए लड़ गया कि वह , अपने वर्ण के अनुसार ऊंची जमीन पर तम्बू लगाना चाहता था । करीब पन्द्रह साल पहले एक हिन्दू ने हिन्दुत्व की रक्षा करने की इच्छा से महात्मा गांधी पर बम फेंका था , क्योंकि उस समय वे छुआछूत का नाश करने में लगे थे । कुछ दिनों पहले तक , और कुछ इलाकों में अब भी हिन्दू नाई अछूत हिन्दुओं की हजामत बनाने को तैयार नहीं होते , हालांकि गैर हिन्दुओं का काम करने में उन्हें कोई एतराज नहीं होता ।

    इसके साथ ही प्राचीन काल में वर्ण व्यवस्था के खिलाफ दो बड़े विद्रोह हुए । एक पूरे उपनिषद में वर्णव्यवस्था को सभी रूपों में पूरी तरह खतम करने की कोशिश की गयी है । हिन्दुस्तान के प्राचीन साहित्य में वर्ण-व्यवस्था का जो विरोध मिलता है , उसके रूप , भाषा और विस्तार से पता चलता है कि ये विरोध दो अलग-अलग कालों में हुए – एक आलोचना का काल और दूसरा निन्दा का । इस सवाल को भविष्य की खोजों के लिए छोड़ा जा सकता है , लेकिन इतना साफ है कि मौर्य और गुप्त वंशों के स्वर्ण-काल , वर्ण-व्यवस्था के एक व्यापक विरोध के बाद हुए । लेकिन वर्ण कभी पूरी तरह खतम नहीं होते । कुछ कालों में बहुत सख्त होते हैं और कुछ अन्य कालों में उनका बंधन ढीला पड़ जाता है । कट्टरपन्थी और उदारवादी , वर्ण व्यवस्था के अन्दर ही एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं और हिन्दू इतिहास के दो कालों में एक या दूसरी धारा के प्रभुत्व का ही अन्तर होता है । इस समय उदारवादी का जोर है और कट्टर पंथियों में इतनी हिम्मत नहीं कि वे मुखर हो सकें । लेकिन कट्टरता उदारवादी विचारों में घुसकर अपने को बचाने की कोशिश कर रही है ।अगर जन्मना वर्णों की बात करने का समय नहीं तो कर्मणा जातियों की बात की जाती है । अगर लोग वर्ण व्यवस्था का समर्थन नहीं करते तो उसके खिलाफ काम भी शायद ही कभी करते हैं और एक वातावरण बन गया है जिसमें हिन्दुओं की तर्क बुद्धि और उनकी दिमागी आदतों में टकराव है । व्यवस्था के रूप में वर्ण कहीं-कहीं ढीले हो गए हैं लेकिन दिमागी आदत के रूप में अभी भी मौजूद हैं । इस बात की आशंका है कि हिन्दू धर्म में कट्टरता और उदारता का झगड़ा अभी भी हल न हो ।

    आधुनिक साहित्य ने हमें यह बताया है कि केवल स्त्री ही जानती है कि उसके बच्चे का पिता कौन है , लेकिन तीन हजार वर्ष या उसके भी पहले जबाला को स्वयं भी नहीं मालूम था कि उसके बच्चे का पिता कौन है और प्राचीन साहित्य में उसका नाम एक पवित्र स्त्री के रूप में आदर के साथ लिया गया है । हालांकि वर्ण-व्यवस्था ने उसके बेटे को ब्राह्मण बनाकर उसे भी हजम कर लिया । उदार काल का साहित्य हमें चेतावनी देता है कि परिवारों के स्रोत की खोज नहीं करनी चाहिए क्योंकि नदी के स्रोत की तरह वहां भी गन्दगी होती है । अगर स्त्री बलात्कार का सफलतापूर्वक विरोध न कर सके तो उसे कोई दोष नहीं होता क्योंकि इस साहित्य के अनुसार स्त्री का शरीर हर महीने नया हो जाता है । स्त्री को भी तलाक और सम्पत्ति का अधिकार है । हिन्दू धर्म के स्वर्ण युगों में स्त्री के प्रति यह उदार दृष्टिकोण मिलता है जबकि कट्टरता के युगों में उसे केवल एक प्रकार की सम्पत्ति माना गया है जो पिता , पति या पुत्र के अधिकार में रहती है । इस समय हिन्दू स्त्री एक अजीब स्थिति में है , जिसमें उदारता भी है और कट्टरता भी । दुनिया के और भी हिस्से से यहां स्त्री के लिए सम्मान पूर्ण पद पाना आसान है लेकिन सम्पत्ति और विवाह के सम्बन्ध में पुरुष के समान ही स्त्री के भी अधिकार हों , इसका विरोध अब भी होता है । मुझे ऐसे पर्चे पढ़ने को मिले जिनमें स्त्री को सम्पत्ति का अधिकार न देने की वकालत इस तर्क पर की गई थी कि वह दूसरे धर्म के व्यक्ति से प्रेम करने लग कर अपना धर्म न बदल दे , जैसे यह दलील पुरुषों के लिए कहीं ज्यादा सच न हो । जमीन के छोटे-छोटे टुकड़े न हों , यह अलग सवाल है , जो स्त्री व पुरुष दोनों वारिसों पर लागू होता है ,और एक सीमा से छोटे टुकड़ों और टुकड़ों के और टुकड़े न होने पायें , इसका कोई तरीका निकालना चाहिए । जब तक कानून या रीति-रिवाज या दिमागी आदतों में स्त्री और पुरुष के बीच विवाह और सम्पत्ति के बारे में फर्क रहेगा ,तब तक कट्टरता पूरी तरह खतम नहीं होगी । हिन्दुओं के अन्दर स्त्री को देवी के रूप में देखने की इच्छा , जो अपने उच्च स्थान से कभी न उतरे , उदार-से-उदार लोगों के दिमाग में भी बेमतलब के और सन्देहास्पद खयाल पैदा कर देती है । उदारता और कट्टरता एक-दूसरे से जुड़ी रहेंगी जब तक हिन्दू अपनी स्त्री को अपने समान ही इन्सान नहीं मानने लगता ।

जारी

8 Responses to “हिन्दू बनाम हिन्दू : डॉ. राममनोहर लोहिया”

  1. अभय तिवारी Says:

    सुन्दर लेख है..और बहुत संतुलित भी.. सिर्फ़ एक बात को आप शायद अलग तरह से कह सकते थे..: “चार हजार साल या उससे भी अधिक समय पहले कुछ हिन्दुओं के कान में दूसरे हिन्दुओं के द्वारा सीसा गलाकर डाल दिया जाता था और उनकी जबान खींच ली जाती थी ।”
    मेरी जानकारी में ये बातें मनुस्मृति से उद्धरित है..और मनुस्मृति एक प्रकार का विधान है..कोई ज़रूरी नहीं कि उस पर पालन होता ही हो..
    शूद्रों के प्रति इस प्रकार के अत्याचार का एक उदाहरण वाल्मीकि रामायण में आता है जब राम ने शम्बूक वध किया.. जो सशरीर स्वर्ग जाने के लिये और देवलोक पर विजय के लिये तपस्या कर रहा था.. उसकी तपस्या के फलस्वरूप एक ब्राह्मण के पुत्र की अकाल मृत्यु हो गई.. और ब्राह्मणों के हाहाकार पर राम ने सारी दिशाओं में खोजकर शम्बूक को चिन्हित किया .. वध किया और फिर देवताओं द्वारा प्रशंसा किये जाने और वर दिये जाने पर बाह्मणपुत्र को पुनर्जीवित करा लिया.. राम ने ऎसा क्यों किया ये मेरे लिये बड़ी पीड़ा और जिज्ञासा का विषय है.. लेकिन सनातन धर्म की संजीविनी शक्ति देखिये.. इस घटना का महिमागान करने वाले वाल्मीकि एक दलित जाति के इष्ट देव हैं..

  2. मनीष Says:

    अच्छी जानकारी के साथ ये विश्लेषण किया है आपने ।

  3. afloo Says:

    अभयजी , मैं आप से सहमत हूँ,यह बात अलग तरह से कही जा सकती थी।
    मनीषजी;अभयजी, यह लेख राममनोहर लोहिया का है।

  4. Pratik Pandey Says:

    अच्छा विश्लेषण है। लेकिन कई बातों से मैं असहमत हूँ। क्या उपर्युक्त लेख में वर्णित लोहिया जी का मत ही आपका मत भी है?

  5. प्रियंकर Says:

    लोहिया जी का बेहतरीन लेख और बेहद नीर-क्षीर विवेकी विश्लेषण . इसे पढने से दिमाग के जाले साफ होते हैं .

  6. प्रमोद सिंह Says:

    भाई मेरे,
    यह आपने बड़ा अच्‍छा काम किया है। वर्ना लोहिया जी के चेलों का तो यह प्रताप है कि उनका लिखा ज्‍यादा आऊट ऑफ सर्कुलेशन है। बीच-बीच में आकर धरम-परम्‍परा ज्ञान लेता हूं। एक बार फिर धन्‍यवाद।

  7. हिन्दू बनाम हिन्दू : डॉ. राममनोहर लोहिया « यही है वह जगह Says:

    [...] का यह महत्वपूर्ण लेख पहले इस ब्लॉग पर छापा जा चुका है । आज , इसका पॉडकास्ट [...]

  8. दिनेशराय द्विवेदी Says:

    पाडकास्ट से पढ़ना अच्छा लगता है। इस लिए इसे पढ़ने यहाँ आया हूँ। इस आलेख की अधिकांश बातें सकारात्मक हैं।

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