कवि ज्ञानेन्द्रपति का ‘पहल’ द्वारा सम्मान,एक कविता
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प्रलेस से जुड़ी साहित्य पत्रिका ‘पहल’ द्वारा प्रतिवर्ष एक रचनाकार का सम्मान उसके शहर में आकर किया जाता है ।इस वर्ष बनारस में कवि ज्ञानेन्द्रपति के सम्मान में यह आयोजन २३ , २४ फरवरी को किया गया । इस आयोजन के ‘डिजाइनर’ ( कार्यक्रम संचालक द्वारा किया गया सम्बोधन) ज्ञानरंजन ने ‘पहल’-सम्मान की प्रस्तावना रखी ।ज्ञानरंजन ने कहा , “ ज्ञानेन्द्रपति अब भी बनारस का खनिज टटोल रहे हैं । बनारस में उन्हें बहुत कुछ मिला मगर जितना मिला उससे कहीं अधिक पाने की पिपासा उनमें दिखाई पड़ती है । हिंसा , लूट ,असहनीय अत्याचार के बीच भी इस शहर में बहुत कुछ बचा हुआ है ।उसी बचे हुए की तलाश जारी है। जो इस शहर को अपना स्पर्श देता है, यह शहर भी उसे अपना स्पर्श देता है। इसका उदाहरण ज्ञानेन्द्रपति हैं । बैलों की तरह उछलने वाली आलोचना उन्हें डिगा नहीं सकी । “
ज्ञानेन्द्रपति की कविता पर ‘पहल’ द्वारा पहले-पहल सम्मानित कवि विजेन्द्र ,लीलाधर मंडलोई , राजेश जोशी और केदारनाथ सिंह द्वारा वक्तव्य दिए गए।
लीलाधर मंडलोई ने ज्ञानेन्द्रपति द्वारा देशज शब्दों के इस्तेमाल का हवाला देते हुए कहा कि भाषाओं के समाप्त होने के दौर में यह भाषा को मृत्यु के जबड़े से निकालने का कवि-कर्म है।उनकी कविताएं वृत्तचित्रात्मकता लेकर उभरती हैं ।
राजेश जोशी : ” वे मेरे अग्रज कवि हैं । १९७० - ‘७२ का दौर मुखर वाग्मिता का दौर था। उसी दौर में लिखीं ज्ञानेद्रपति की कविता में जीवन के बहुत आस-पास के दृश्य थे । इस पर ‘कलावाद’ के प्रभाव का सन्देह भी होता था । ‘पढ़ते-गढ़ते’ (कथेतर गद्य) में ज्ञानेन्द्रपति ने नक्सलवादी आन्दोलन के प्रभाव का जिक्र करने के साथ-साथ यह भी बताया था कि इस प्रभाव में रूढ़िग्रस्तता भी प्रकट होती है । वे इससे मुक्त थे।
सिर्फ़ सन्दर्भों से स्मृतियाँ नहीं जगाई जातीं। ज्ञानेन्द्रपति की भाषा में ऐसा कुछ है , जो परम्परा के साथ पुल बनाता है । उनके वर्णन कि तफ़सील पर गौर करने पर लगता है मानों उन्हें पहले ही नोट कर संभाल लिया होगा ।
ज्ञानेन्द्रपति का ‘गंगा तट’ काव्यों का संग्रह नहीं न्यास है । वह औपन्यासिक है। मुक्तिबोध की ‘अंधेरे में’ के बारे में कहा जाता है कि वह नेहरू-युग का क्रिटीक है । इस युग का क्रिटीक ‘गंगा तट’ है।
उनकी कविता में ऑब्जर्वेशन की कोशिश है और ज़िद भी । इस वजह से उनकी कविता प्रतिबद्धता और वैचारिकता के सरलीकरण का चित्र हैं ।ऑब्ज़र्वेशन में व्यवधान भी है और ताकत भी । वे पर्फ़ेक्शनिस्ट हैं ।
विजेन्द्र : ” ऐसा अक्सर होता है कि हम कवियों के बारे में बहुत बड़ी-बड़ी बात कह देते हैं लेकिन भविष्य में वह असत्य हो जाती हैं । इससे विपरीत एक वाकया हुआ जिसकी मुझे अत्यन्त खुशी है। वर्ष १९७० में पटना में हुए युवा साहित्यकारों के एक सम्मेलन में मैंने ‘कविता:नई भाषा की तलाश’ विषयक एक लेख प्रस्तुत किया था । उस लेख में मैंने ज्ञानेन्द्रपति की एक पूरी कविता उद्धृत की थी और कहा था कि वे भविष्णु कवि हैं ।
ज्ञानेन्द्रपति निराला की परम्परा के कवि हैं।उनकी कविता रचनात्मक प्रतिरोध की कविता है।वे , जो खत्म हो रहा है उसे दिखाने के अलावा जो अच्छा होना चाहिए उसके संकेत देती हैं।
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सम्मान के प्रत्युत्तर में ज्ञानेन्द्रपति : ” साहित्य-जगत में निराला और प्रसाद , मुक्तिबोध और अज्ञेय, सगुण धारा और निर्गुण धारा के बीच बहस चलती आई है।अब हम हम सगुण और निर्गुण को अलग न करके उसे भक्तिकाल के रूप में जानते हैं। मैं भावाभिभूत हूँ क्योंकि समकालीन कविता के दो ध्रुव केदारनाथजी और विजेन्द्रजी यहाँ साथ-साथ मौजूद हैं।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से पूर्व अनुभूति की स्वतंत्रता का महत्व है।फासी शासनों में अभिव्यक्ति के सार्थक प्रयासों के प्रमाण हैं ।भारत में एक छोटे काल-खण्ड में अभिव्यक्ति को छीनने का प्रयास हुआ था। तब पटना के नुक्कड़ों पर हुए काव्य-पाठ में नागार्जुन के साथ मैं भी मौजूद था । स्वाधीनता मेरे लिए हवा-पानी की तरह जरूरी है। आज अनुभूति की स्वतंत्रता हासिल करना बड़ी चुनौती है । अनुभूति की स्वतंत्रता के रचनात्मक अवसर कम होते जा रहे हैं। अनुभूति की स्वतंत्रता को हरने का प्रयास मीडिया द्वारा सफलतापूर्वक किया जा रहा है ।मैंने कुछ कविताएं लिखी ही न होतीं यदि उन विषयों पर अखबारों ने गौर किया होता ।
इस सम्मान को मैं उपलब्द्धि के नाते नहीं अपितु साहित्य-जगत की शुभ-कामना के रूप में स्वीकार कर रहा हूँ ।
बर्तोल्ट ब्रेख़्ट ने चीन के के शीशे के शेर के शिल्प पर अपनी कविता में लिखा था कि उसके नुकीले नाखूनों वाले पंजों से बुरे लोग डरते हैं और उसके सुन्दर सौष्ठव से अच्छे लोग प्रसन्न हों। - यही सुनना चाहता हूँ मैं अपनी कविता के बारे में । “
समारोह के अध्यक्ष केदारनाथ सिंह ने कहा , “ ज्ञानेन्द्रपति की कविता का बिलकुल अलग साँचा है , जो सिर्फ़ उनका है।उसे दूर से पहचाना जा सकता है । बहुत सारे जोखिम उठा कर कविता का नया चेहरा उन्होंने तैयार किया है ।
मैं बनारस छोड़कर बरसों से दिल्ली में हूँ लेकिन दिल्ली मेरी नहीं हुई । त्रिलोचन के बनारस से जाने और धूमिल के आकस्मिक रूप से चले जाने से बनारस में जो रिक्तता आई थी उसे ज्ञानेन्द्रपति ने पूरा किया है । साहित्यिक समाज में आए ठहराव को गतिशील करने के लिए वे ठहर गए। उनकी विलक्षणता ऐसी है कि असुन्दर को भी काव्य-भंगिमाएं दीं । विद्यार्थी जीवन में दुर्गाकुण्ड जाते समय मुड़कट्टा बाबा के पास से गुजरते वक्त मैं भी असहज हो जाता था,पर उस पर कविता न लिख सका। ज्ञानेन्द्रपति ने उस पर सुन्दर कविता लिखी । “
इस आयोजन के अवसर पर ज्ञानेन्द्रपति द्वारा चयनित कविताओं का संग्रह ‘ कवि ने कहा ’ का लोकार्पण भी हुआ।किताबघर प्रकाशन( ४८५५-५६/२४, अंसारी रोड,दरियागंज , नयी दिल्ली-११०००२) द्वारा प्रकाशित इस किताब की कीमत सत्तर रुपए है । इस संकलन में उनके तमाम प्रकाशित संग्रहों से तो हैं हीं , आगामी संग्रहों से भी कविताएँ शामिल हैं,बल्कि अनेक तो पहली बार उक्त संग्रह में ही प्रकाशित हो रही हैं ।
ज्ञानेन्द्रपति ने इस चिट्ठे के लिए कविता चुनने की मुझे सहर्ष अनुमति दी है । मैं कृतज्ञ हूँ।
बीज व्यथा
वे बीज
जो बखारी में बन्द
कुठलों में सहेजे
हण्डियों में जुगोए
दिनोदिन सूखते देखते थे मेघ-स्वप्न
चिलकती दुपहरिया में
उठँगी देह की मूँदी आँखों से
उनींदे गेह के अनमुँद गोखों से
निकलकर
खेतों में पीली तितलियों की तरह मँडराते थे
वे बीज-अनन्य अन्नों के एकल बीज
अनादि जीवन-परम्परा के अन्तिम वंशज
भारतभूमि के अन्नमय कोश के मधुमय प्राण
तितलियों की तरह ही मार दिये गये
मरी पूरबी तितलियों की तरह ही
नायाब नमूनों की तरह जतन से सँजो रखे गये हैं वे
वहाँ-सुदूर पच्छिम के जीन-बैंक में
बीज-संग्रहालय में
सुदूर पच्छिम जो उतना दूर भी नहीं है
बस उतना ही जितना निवाले से मुँह
सुदूर पच्छिम जो पुरातन मायावी स्वर्ग का है अधुनातन प्रतिरूप
नन्दनवन अनिन्द्य
जहाँ से निकलकर
आते हैं वे पुष्ट दुष्ट संकर बीज
भारत के खेतों पर छा जाने
दुबले एकल भारतीय बीजों को बहियाकर
आते हैं वे आक्रान्ता बीज टिड्डी दलों की तरह छाते आकाश
भूमि को अँधारते
यहाँ की मिट्टी में जड़ें जमाने
फैलने-फूलने
रासायनिक खादों और कीटनाशकों के जहरीले संयंत्रों की
आयातित तकनीक आती है पीछे-पीछे
तुम्हारा घर उजाड़कर अपना घर भरनेवाली आयातित तकनीक
यहाँ के अन्न-जल में जहर भरनेवाली
जहर भरनेवाली शिशुमुख से लगी माँ की छाती के अमृतोपम दूध तक
क़हर ढानेवाली बग़ैर कुहराम
वे बीज
भारतभूमि के अद्भुत जीवन-स्फुलिंग
अन्नात्मा अनन्य
जो यहाँ बस बहुत बूढ़े किसानों की स्मृति में ही बचे हुए हैं
दिनोदिन धुँधलाते-दूर से दूरतर
खोए जाते निर्जल अतीत में
जाते-जाते हमें सजल आँखों से देखते हैं
कि हों हमारी भी आँखें सजल
कि उन्हें बस अँजुरी-भर ही जल चाहिए था जीते जी सिंचन के लिए
और अब तर्पण के लिए
बस अँजुरी-भर ही जल
वे नहीं हैं आधुनिक पुष्ट दुष्ट संकर बीज-
क्रीम-पाउडर की तरह देह में रासायनिक खाद-कीटनाशक मले
बड़े-बड़े बाँधों के डुबाँव जल के बाथ-टब में नहाते लहलहे ।
(संशयात्मा से संकलित)
- ज्ञानेन्द्रपति
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जन्म
झारखण्ड के एक गाँव पथरगामा में ।
दसेक वर्षॊं तक बिहार सरकार में अधिकारी ।
सम्प्रति , कुलवक्ती कवि ।
प्रकाशित
‘ आँख हाथ बनते हुए’ (१९७०)
‘शब्द लिखने के लिए ही यह कागज़ बना है’ (१९८१)
‘गंगातट’ (२०००)
‘संशयात्मा’ (२००४)
‘भिनसार’ (२००६)
- सभी कविता-संग्रह ।
‘एकचक्रानगरी’ (काव्य-नाटक)
‘पढ़ते-गढ़ते’ (कथेतर गद्य : २००५)
- भी प्रकाशित ।
आवास
बी- ३/१२, अन्नपूर्णानगर , विद्यापीठ मार्ग , वाराणसी-२२१००२


February 26, 2007 at 2:15 pm
बहुत अच्छा लगा सारा विवरण पढ़कर! पहल पत्रिका का सम्मान बहुत अच्छा आयोजन है। सम्मानित को उसके शहर में जाकर सम्मान करने का अपना ही महत्व है। ज्ञानेन्द्रपतिजी की कवितायें पढ़ता-प्रभावित होता रहा। उनको सम्मानित होते देख बहुत अच्छा लगा। रिपोर्ट आपने बड़ी अच्छी लिखी। बधाई!
February 26, 2007 at 2:16 pm
वाह ! अफ़लातून भाई, ज्ञानेन्द्रपति के पहल सम्मान समारोह की बहुत अच्छी रपट पेश की आपने . इस रपट को पढ़ कर बनारस न आ पाने का दुःख कुछ कम हो गया . पर न आ पाने का दुःख तो है और वह पूरी तरह तो बनारस का एक चक्कर लगाने पर ही कम होगा . अभी ०३ फ़रवरी को जयपुर में मैं कुछ घंटों के लिये विजेन्द्र जी के साथ था. तब भी सोचा था कि पहुंच सकूंगा.
पर सोचा हुआ हर बार हो ही जाये ऐसा कहां होता है.
February 26, 2007 at 2:27 pm
अफ़लातूजी धन्यवाद,
बहुत अच्छा लगा पढ़कर! कवि ज्ञानेन्द्रपतिजी को सम्मानित होते देख बहुत अच्छा लगा। पहल सम्मान समारोह की बहुत सुन्दर झलक दिखलाई है आपने। ज्ञानेन्द्रपतिजी को बधाई एवं आपको एक बार फिर से धन्यवाद।
February 26, 2007 at 2:53 pm
अफ़लातून जी, पिछ्लए दिनों आपकी अनुपस्थिति खल रही थी, पर आपने यह रपट पेश करके हमारी शिकायत दूर कर दी.
बहुत रोचक प्रस्तुति है, धन्यवाद
February 26, 2007 at 8:36 pm
कवि ज्ञानेन्द्रपति के सम्मान, पहल संस्था के विषय मे और कवि ज्ञानेन्द्रपति की कविता-अच्छा लगा पढ़कर. बहुत शानदार और रुचिकर पेशकश. आपका साधुवाद.
February 27, 2007 at 4:12 am
अच्छा लगा पढकर । उनकी कविता प्रस्तुत की आपने ,धन्यवाद ।
March 21, 2007 at 12:51 am
कवि ज्ञानेन्द्रपति की ‘बीज व्यथा’ काफ़ी अच्छी लगी पढ कर। कवि ने बडे ही सुन्दर डन्ग से प्रचीन खेती की पद्धति और आधुनिक पद्धति की तुलना की है। कवि का ये व्यन्गय मुझे काफ़ि अच्छा लगा। ये इन्टर्नेट पर ये स्टेज भी अच्छी लगी। हिन्दी को इस माध्यम की काफ़ी जरुरत भी है, अप्नी अन्तराष्टीय पहचान् को और् उपर ले जाने के लिये।
धन्यवाद
May 30, 2007 at 9:43 am
accha laga.