कवि ज्ञानेन्द्रपति से वार्ता (२)

प्रश्न : वैश्वीकरण व बाजार का अनन्त-सा विस्तार , सूचना व संचार प्रौद्योगिकी का विकास व विस्तार तथा अमेरिकी युद्धों के चलते जो उथल - पुथल दुनिया में हो रही है उसे मनुष्य के वर्तमान और भविष्य की दृष्टि से आप कैसे देख रहे हैं ?

उत्तर : यह सुहाने झूठों का समय है : जिसे वैश्वीकरण कहा जा रहा है , वह वस्तुत:             भू-बाजारीकरण है , अमेरिका के नेतृत्व में पश्चिमी व्यापारी शक्तियों द्वारा एशिया , अफ्रीका , लतिनी अमेरिका , के देश-समाजों को नव-उपनिवेशन की गिरफ्त में जकड़ने का प्रयास । दूसरे शब्दों में , यह नव साम्राज्यवाद का दौर है । इसमें प्रमुख भूमिका संचार माध्यमों को निभानी है । साठ के दशक में ही ‘अन्डरस्टैडिंग मीडिया’ के लेखक मार्शल मैक्लुहान ने ‘ग्लोबल विलेज’ - विश्वग्राम-की अवधारणा रखी थी । इस विश्व ग्राम का चौधरी अमेरिका है । सांस्कृतिक साम्राज्यवाद को आगे किए नव साम्राज्यवाद विश्व-विजय को आतुर है । ज्ञान का स्थान सूचना ने ले लिया है । सूचना-संजाल का इस्तेमाल विभिन्न देश-समाजों की विविधताओं को मिटाकर एक बाजारू एकरूपता लाने में किया जा रहा है । अभी यूनेस्को ने दो (अमेरिका और इज़राइल) के विरुद्ध एक सौ अड़तालीस देशों के बहुमत से देशीय सांस्कृतिक विशिष्टता के विशेष प्रावधानों के द्वारा रक्षा किए जाने का प्रस्ताव पारित किया है । गोया ,पश्चिमी पूँजीवादी देशों में भी अमेरिका की हालिवुडीय संस्कृति के आक्रामक प्रसार को लेकर चिन्ता व्यापने लगी है । बहुत पहले ही फ्रांस की संसद ने ‘राइट टू कल्चर’-संस्कृति का अधिकार विषयक प्रस्ताव पारित किया था । युद्ध को आँखों का भोज्य बनाने का - ‘इन्फ़ोटेनमेंट’ का हिस्सा बनाने का - सिलसिला पिछले खाड़ी युद्ध (१९९१) से ही शुरु हो गया था । चाक्षुष माध्यमों के द्वारा रचे जा रहे माया जगत में युद्ध और मनोरंजन एक-मेक हो गये हैं । ऐसे में , मानवीय संवेदना का क्षरण महसूस भी नहीं होता । पश्चिमी पूँजीवाद संकट ग्रस्त है और अपने परोपजीवी अस्तित्व को बनाए रखने के लिए के लिए खनिज-संपदा और जन-श्रम से समृद्ध तथाकथित तीसरी दुनिया के देशों के शोषण और युद्ध-सामग्री के विपणन पर निर्भर है ।आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध शुरु होने से पहले , और आज भी , पूरी दुनिया में आतंकवाद-और राज्य-आतंकवाद भी- को प्रश्रय देने की नीति अमेरिका की विदेश नीति का प्रमुख हिस्सा रही ताकि युद्ध का वातावरण बना रहे और हथियारों का बाजार गर्म रहे । युद्ध के पैरोकार - हंटिंग्टन जैसे लोग ”क्लैशेस आव सिविलाइजेशन’ सभ्यताओ के संघर्ष की बात कह रहे हैं । वे यह नहीं देखते कि पूंजीवादी सभ्यता के बलात आरोपण के प्रतिक्रियास्वरूप मुख़्तलिफ़ देश-समाजों में मूल गामी-फंडामेंटलिस्ट-तत्त्वों के उदय और सामाजिक वर्चस्व का घना सम्बन्ध है । नॊम चॊम्स्की ने बहुत पहले ही इस बात को लक्षित किया था कि अमेरिकी प्रभाव वाले अरब देशों यथा सउदी अरब और कुवैत में धार्मिक कट्टरता , अनाधुनिकता और स्त्रियों की बदहाली सर्वाधिक है । कहना न होगा कि मानवता के भविष्य के लिए यह गम्भीर संकट का दौर है ।मुझे अस्तित्ववादी दार्शनिक कीर्केगार्द की कही एक बात याद आ रही है ।उनका कहना है : जो स्वतन्त्रता हमारे पास नहीं होती , हम उसकी चिन्ता और माँग करते हैं , जैसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता । लेकिन जो स्वतंत्रता हमे मिली होती है हम प्राय: उसका इस्तेमाल नहीं नहीं कर पाते , मसलन वैचारिक स्वतंत्रता । अमेरिका स्वयं को मानवाधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का वैश्विक संरक्षक घोषित करता है,लेकिन ‘लोकतंत्र’ की स्थापना के लिए ‘रेजीम-चेंज’ के नाम पर संप्रभु सरकारों का तख्तापलट कर कठपुतली सरकारों का आरोपण उसका सहज दानवाधिकार है । बहुत पहले , हिन्दी के कवि-कथाकार गजानन माधव मुक्तिबोध ने अपनी एक कहानी में बताया था कि भारत के हर बड़े शहर में एक अमेरिका है । अमरीका की विश्व-विजय हमारे मस्तिष्क को एक खास साँचे में ढालकर ही सम्भव और सम्पूर्ण होगी । गोया , जब हम अपनी वैचारिक स्वतंत्रता का भी इस्तेमाल करने के काबिल नहीं बचेंगे । यह एक बड़ा खतरा है जिसको बूझे और जिससे जूझे बिना मानवता का भविष्य सँवर नहीं सकता ।

(साभार : डंकेल प्रस्ताव को कैसे समझें व गैट का गड़बड़झाला)

प्रश्न : काफी समय से हम साहित्यकारों से चर्चा कर रहे हैं , उसमें उनकी यह समझ उभरकर आती है कि आज उनके शब्द सामान्य जन तक नहीं पहुँच रहे हैं । इसमें आपका क्या कहना है ?

उत्तर : पहले तो जनता को मोहविष्ट रखने के लिए धर्म की अफीम (बकौल मार्क्स) ही थी अब उसे मदहोश रखने के लिए निरन्तर मनोरंजन की अफीम चटायी जा रही है , बल्कि इधर तो मनोरंजन में धर्म मिला देने से नशा खासा मादक बल्कि मारक हो गया है । पूरी तरह आधुनिक बनने से पहले हम उत्तर आधुनिक युग में पहुँच चुके हैं । जनता टुकुर-टुकुर ताकने की अभ्यस्त हो गयी है - टेलीविजन के पर्दे को, अखबारों के रंगीन कभी-कभी तो रक्त-रंजित पृष्ठों को , अपने नेताओं के वाचाल मुँह को जिससे झूठे आश्वासनों की माया-वर्षा होती रहती है, या फिर क्रिकेट-खिलाड़ियों और फिल्मी सितारों के कृत्य-नृत्य को । इस महिमामयी चित्रशाला में किसी एक कोने में भी लेखक की ब्लैक एण्ड व्हाइट तस्वीर की भी जगह नहीं है। लेखन या कि लेखक ने जनता से किनारा नहीं किया है,जनता ने ही आँखें फेर ली हैं ।जनता की आँखें बँधी हैं ।संस्कृति के सर्जक को संस्कृति के उपभोक्ता में बदल दिया गया है ।आज भी सामान्य जन के जीवन-संघर्ष की, उसके लहूलुहान होते हुए भी अपराजेय जीवट की महागाथा साहित्यिक विधाओं में ही लिखी जा रही है- वह चाहे कविता हो या कहानी-उपन्यास या नाटक-निबन्ध । यह भी गौरतलब है कि आज का लेखक धर्म के राजरथ पर सवारी नहीं कर रहा है । और न ही उसे टेलीविजन-वीडियो माध्यम का आशुगामी अश्व नसीब है । वह निहत्था है और उसे तमाम सत्ताओं से जूझना है - संगठित धर्म की सत्ता से,दिनोदिन नृशंस होती राजसत्ता से , लोलुप धन सत्ता से । नई विश्व-व्यवस्था में एक तरफ तो भारतीय जनता की बौद्धिक सम्पदा की डकैती बहुराष्ट्रीय कंपनियों व निगमों द्वारा तरह-तरह के पेटेन्टों के माध्यम से खुलेआम जारी है,दूसरी तरफ़ जनता और साहित्य के बीच मुफलिसी और निरंतर मनोरंजन के अवरोध खड़े कर । ऊपर से , जनता और साहित्य के बीच पुल बनाने की जिम्मेदारी लाभ-लोभ की व्यावसायिकता से ढक गई है : कवि सम्मेलनों और मुशायरों का मंच मनोरंजन-उद्योग के व्यापारियों के हत्थे चढ़ गया है, जहाँ चुटकुलों-पगे हास्य-व्यंग्य कवि सम्मेलन ही गुंजायमान रहते हैं ; हिन्दी के प्रकाशन जनता की आर्थिक समाई में आने लायक जनसुलभ संस्करण न छाप किताबों के राजसी संस्करण सरकारी पुस्तकालयों की ओर मुँह किये धड़ाधड़ छाप रहे हैं। जबकि पुस्तकालय मर रहे हैं, जो बमुश्किल बचे हैं वे किताबों के कारागार भर हैं, वे खुलते नहीं,खुलते हैं तो खिलते नहीं,उबासी लेती हुई एक मलिन उदासीनता वहाँ आपका स्वागत करती है - अनिच्छापूर्वक। बावजूद इसके, भारतीय भाषाओं के साहित्य में बखूबी दर्ज हो रहा है,जिसकी कुछ झलक-भर भारतीय अंग्रेजी साहित्य में मिलती है जो पश्चिमी या पश्चिममुखी देसी बाजार में मंहगे दामों में बिकने में सफल है । बाजार की मुखालफत भी सच्चे साहित्य को मंहगी पड़ रही है।लेकिन इससे क्या ?’जनता का साहित्य कैसा हो’ शीर्षक निबन्ध में मुक्तिबोध ने बताया है कि जनता का साहित्य जरूरी नहीं कि तत्काल उसे हस्तगत हो जाय याकि पूरा-पूरा समझ में ही आ जाय । बौद्धिक सम्पदा के सृजन का काम तमाम बाधाओं के बावजूद अनवरत जारी रहना चाहिए- वह जनता की ही सम्पत्ति है , आज नहीं तो कल वह उसे बरतेगी । ( साभार: लोकविद्या-संवाद,सारनाथ,वाराणसी)

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