प्रश्न : सामान्य मनुष्य के पास जो ज्ञान है उसके प्रति आज साहित्य की क्या संवेदनायें हैं ?
उत्तर : हमारे मस्तिष्क पर नव यौवन काल में पढ़े गए माओ त्से तुंग – जिन्हें आजकल माउजे दोंग लिखा कहा जाता है – के विख्यात येनान भाषण की गहरी छाप है । इसमें उन्होंने साहित्य – संस्कृतिकर्मियों को सम्बोधित करते हुए व्यापक जनता के पास जाने का आह्वान किया था – उससे सीखने के लिए और तब जनता से पाई गई चीजों को ही सँवार कर वापिस उसे लौटाने के लिए । सच पूछा जाय तो मानवता की सर्वोत्तम उपलब्धियाँ श्रमशील जनता के हाथों ही सम्भव हुइ हैं।आग को किसने पालतू बनाया था ? चक्के का अविष्कार किसने किया था , जिसके बल पर सभ्यता ने अग्रतर यात्रा की ? मिट्टी को पकाकर किसने पहली ईंट बनाई ? पहली नाव किसने सागर में उतारी ? पशुता को सभ्यता का वसन पहनाने वाली सूई का आविष्कारक कौन था ? श्रमगीतों को लोकगीतों में ढा़लने वाले कण्ठ किनके थे ? जिनकी मानस-भूमि मिथकों की जन्मभूमि बनी , वे अनाम हैं ।यह व्यापक जन समुदाय ही है , जिसने अपने सामूहिक जीवन – संघर्ष के दौरान तमाम उपयोगी और कलात्मक वस्तुओं का सृजन किया । अविष्कार के रूप में अपना नाम चलाने की कोई चिन्ता हमारे इन महान पूर्वजों के मन में नहीं पलती थी । जीवनव्यापी प्रयोगशीलता से इन्होंने अनाजों की हजारों किस्में विकसित कीं । यदि केवल – एशिया के मुख्य खाद्य – धान/चावल को ही देखा जाय तो इसकी हजारों किस्में विकसित की गईं । इसी तरह विभिन्न भाषाएँ और मुख़्तलिफ़ संस्कृतियाँ आकार ले पाईं । आज इन सब पर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों/निगमों की लालची-लुटेरी निगाहें गड़ी हैं । जैविक विविधताएँ और साथ ही सांस्कृतिक विविधताएँ नष्ट हो रही हैं । जिस प्रजाति के बीज अब हमारे खेतों में उगते नहीं मिलेंगे वे पश्चिमी जीन बैंकों में सुरक्षित हैं , और संकर बीजों को बनाने के काम आ रहे हैं , आने वाले हैं। भारतीय खेतों के लिए निरबंसिया बीजों को बेचने की ही तैयारी है । बहरहाल जहाँ तक मेरी बात है , अपने सर्जनात्मक अनुभवों के सहारे मैं जिस निष्कर्ष तक पहुँचा हूँ उसे एक पद के रूप में व्यक्त करूँ तो वह है – ‘ उपयुक्त प्रथम श्रोता ‘ का सिद्धान्त। कोई रचना पूरी होते ही उसे पहले-पहल सुनाने के लिए मैं किसी ऐसे व्यक्ति की तलाश करता हूँ जिसके जीवनानुभव – क्षेत्र से उसका सम्बन्ध हो । ‘ गंगातट ‘ में शामिल मेरी कविताएँ बनारस के सबसे बूढ़े मल्लाह शिवनाथ माँझी – मेरे शिवनाथ बाबा – को सुनाने के बाद उन्नत हुई हैं । उसी तरह , मुझे याद है , मेरी एक ‘थनैली’ शीर्षक कविता – जो चलती ट्रेन में लिखी गयी थी – जो सूजे हुए थनों वाली -थनैली से पीड़ित – एक गाय से और उसकी देशीय चिकित्सा से सम्बन्धित है , तभी मुकम्मल हो पाई जब मैंने उसे अपने गाँव में बूढ़े ग्वाल दादा को सुनाया । सच पूछिए तो वस्तुनिष्ठ जीवन – दृष्टि वाले रचनाकार की हर रचना उसके लिए सीखने का एक अवसर होती है , ग्रहणशीलता के बगैर रचना सम्भव नहीं होती । जीवन – संघर्ष में लगे हुए हर व्यक्त के पास वह संजीवनी है , जो हमारी जिजीविषा को धार दे सकती है ।
यह सच है कि हमारे साहित्यिक- सृजन-संसार में एक बड़ा हिस्सा ऐसी रचनाओं का है , जो अपनी प्रकृति में आत्मनिष्ठ हैं और उनका ‘आत्म’ व्यापक समाज से तदात्म नहीं है । ऐसे रचयिता अपने वाक विलास को उच्चभ्रू वर्गों की सेवा में नियोजित करते हैं । उन्हें दरकिनार किया जाय तो जनता से बावस्तगी रखने वाला साहित्य जन-चिन्ताओं को अपनी बौद्धिक शिराओं में धारण करता है । पिछले वर्षों – इसे उत्तर आधुनिक परिदृश्य भी कह सकते हैं – समाज के दलित वर्गों से अनेक लेखक प्रमुखतया अपनी आत्मकथात्मक रचनाएँ लेकर सामने आए हैं जिनमें सामुदायिक व्यथा बोलती है । आधी मनुष्यता – जिसकी व्यथा-कथा को कहने का जिम्मा भी मर्द लेखकों ने ही लिया हुआ था – की प्रामाणिक दास्तान कहने के लिए बड़ी संख्या में नारियों ने अपना संतप्त कंठ खोला है । मुख्यधारा से बाहर रहते आए आदिवासी समाजों के भीतर से भी अनेक लेखक ध्यानपूर्वक सुने जाने लगे हैं। गोया , व्यापक समाज के अधिकतर तबकों की अभिव्यक्तियाँ साहित्य में लोकतान्त्रिक स्पेस पा रही हैं । ( जारी )
बल्ली सिंह चीमा(बाएँ) और ज्ञानेन्द्रपति (फोटो:अफ़लातून)
Technorati tags: gyanendrapati, interview

March 11, 2007 at 3:21 am |
कृपया यह आलेख पूर्ण कर यानी कि एक पूर्ण साक्षात्कार आप ज्ञानेंद्र पति जी का हमारे साइट के लिए क्या भेज सकते हैं ।
जयप्रकाश मानस