गंगा , चाय बागान और काशी विश्वविद्यालय (गतांक से )

स्थानीय निकायों की भूमिका का महत्व बढने के साथ साथ उनके प्रति अगंभीर रवैए का जारी रहना भी गौरतलब है.मसलन हाल तक पश्चिम बंगाल के चाय बागानों के बीच बसे गांवों को पंचायती व्यवस्था से पृथक रखा गया था. राज्य की वाम मोर्चा सरकार का तर्क था कि इन गांवों में जल-आपूर्ति ,प्राथमिक शिक्षा और प्राथमिक चिकित्सा की जिम्मेदारी चाय बागान प्रबन्धन की होगी.सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल एक याचिका के फलस्वरूप चाय बागानों के बीच बसे गांवों को पंचायतराज व्यवस्था से जोडना पडा है.

  वाराणसी के ‘कैंटोन्मेन्ट बोर्ड’ तथा ‘मुगलसराय रेलवे सेटेलमेंट एरिया’ के स्वतंत्र स्थानीय निकाय हैं जिनका नियमित चुनाव होता है.संविधान की केन्द्रीय अनुसूची का एक विषय ‘ काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ‘ भी वाराणसी में स्थित है.विश्वविद्यालय की स्वतंत्र टाउन एरिया कमिटी और नोटीफाईड एरिया कमिटी रही है जिसके द्वारा परिसर में सफाई का काम किया जाता है और जन्म मृत्यु प्रमाणपत्र दिया जाता था.इस कमिटी का चुनाव विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा नहीं कराया जाता .परिसरवासियों के स्थानीय निकायों में अधिकार का प्रश्न उठाए जाने के बाद गत तीन चुनावों से परिसर की कालोनियों को वाराणसी नगर निगम के तीन वार्डों से जोड दिया गया है.परिसर के अन्तेवासी अथवा विश्वविद्यालय प्रशासन नगर निगम की की गृह कर अथवा जल कर की मद में एक पैसा टैक्स नहीं देते इसके बावजूद इन्हे नगर निगम से इस इसलिए जोड दिया गया है तकि नोटिफाईड एरिया कमिटी का चुनाव न कराना पडे.वारा्णसी जिले की जनगणना रपट में भी शहरी क्षेत्र,ग्रामीण क्षेत्र और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय नोटीफाईड एरिया कमिटी अलग अलग प्रविष्टि के रूप में दिए जाते रहे हैं. गत दस वर्षों से छात्रसंघ , अध्यापक संघ और कर्मचारी संघ के चुनाव न कराने वाला विश्वविद्यालय प्रशासन लाजमी तौर पर नोटीफाईड एरिया कमिटी के चुनाव कराने से बचना चाहता है.

शहरी आबादी की तेज वृद्धी के साथ साथ एक ओर जहां हजारों करोड रुपए की  ‘शहरी पुनर्निर्माण योजनाएं’ नगर निगमों में कालोनाईजरों , बिल्डरों, ठेकेदारों और भ्रष्ट अदिकारियों के गठजोड को फलने – फूलने का अवसर देंगी वहीं शहरी जीवन में अपने छोटे छोटे योगदान देने वाले कारीगरों , बुनकरों , पटरी व्यवसाइयों ,फेरीवालों,रिक्षेवालों जैसे सभ्यता के हाशिए पर मौजूद तबकों पर विस्थापन का दबाव बढ जाएगा.गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में हुए स्थानीय निकाय के चुनाव में मुख्यधारा के दलों ने इसे चुनावी मुद्दा न बनाना ही श्रेयस्कर समझा.

                                                – अफ़लातून.

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