उपेक्षित स्थानीय निकाय
भारत के नागरिक तीन स्तरों पर अपने प्रतिनिधि सीधे चुन कर भेजते हैं.लोकसभा और विधानसभा के अलावा त्रिस्तरीय जिला पंचायत (देहाती इलाकों में ) अथवा नगर निकाय. लोकसभा , विधानसभा और विधानपरिषद (जिन राज्यों में हो ) के चुनाव ‘भारत के निर्वाचन आयोग’ द्वारा कराए जाते हैं एवं स्थानीय निकायों के चुनाव ‘ राज्य निर्वाचन आयोग ‘ द्वारा. राज्य निर्वाचन आयोग भी एक संवैधानिक संस्था है जो ‘ भारत के निर्वाचन आयोग ‘ के अधीन नहीं है .भारत के निर्वाचन आयोग द्वारा राज्य निर्वाचन आयोगों से तालमेल बैठाने के लिए बैठकें की जाती रही हैं किन्तु अब तक कई बुनियादी मामलों में सहमति नहीं बन पायी है . इसका ख़ामियाजा लोकतांत्रिक प्रक्रिया की कमजोरी तथा उससे उत्पन्न लोकतांत्रिक अधिकारों की कटौती में देखा जा सकता है . लोकसभा और विधानसभा चुनाव के लिए जिस मतदाता सूची का प्रयोग होता है उससे अलग स्थानीय निकायों की मतदाता सूची है.फोटो पहचान पत्र सिर्फ़ भारत के निर्वाचन आयोग द्वारा जारी किए गए हैं, राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा नहीं. अलग मतदाता सूची होने के कारण ‘मतदाता परिचय पत्र ‘ स्थानीय निकाय चुनाव हेतु अमान्य हैं.परिचय पत्र में में दर्ज़ मतदाता के क्रम संख्या और भाग संख्या स्थानीय निकाय की मतदाता सूची से भिन्न है. रजनैतिक दलों की बाबत भी राज्य निर्वाचन आयोग का रवैया मनमाना और छोटे दलों के प्रति भेदभावपूर्ण है.राज्य और राष्ट्रीय स्तर के मान्यताप्राप्त दलों को राज्य निर्वाचन आयोग अपने दफ़्तर में पंजीकरण न होने के बावजूद वह सभी सुविधायें देता है जो भारत के निर्वाचन आयोग द्वारा उन्हें जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत उन्हे दी जाती हैं.मसलन, निश्चित चुनाव चिह्न का आवण्टन तथा निर्वाचन प्रक्रिया के दौरान उम्मीदवार की मृत्यु हो जाने पर चुनाव रद्द किया जाना आदि.भारत के निर्वाचन आयोग में पंजीकृत गैरमान्यताप्राप्त राजनैतिक दलों को जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत चुनाव चिह्न आवण्टन में जो वरीयता दी जाती है उसे राज्य निर्वाचन आयोग नहीं मानता तथा ऐसे दलों को राज्य आयोग में दस हजार रुपये शुल्क के साथ फिर पंजीकरण करवाता है.ऐसे दलों के प्रत्याशियों के सभी उम्मीदवारों के कुल वोटों की गिनती तथा विजयी प्रत्याशियों पर दलबदल विरोधी कानून किए जाने से भी भी ये दल वंचित हो जाते हैं.( जारी )